रात अनगिनत आँखों से देखती रही
तेरे गम का कारवां
अश्क ओस बन टपकते रहे दरख्तों से
और दिल की दीवारों पे
बनने लगे कुछ भीगे से नक़्शे
यादों की हल्की सी धुंध
धीरे धीरे लिपटने लगी
हर ज़र्रे से
और उभरने लगे अल्फाज़
एक पहचानी सी कहानी के
अश्कों से सराबोर
अधूरे से इस ख़त के टुकड़े
शायद तुम्हे कहीं राहों में मिलें
हवा का इक तेज़ झोंका
धोखे से इसे
उड़ा ले गया था
सूखे पेड़ों की टहनियों में फंस
तार तार हो चुका है दामन उसका
अनकहे लफ्ज़, कुछ मिसरे
कुछ गीतों के बोल
जो गाये थे हमने कभी
कुछ चाहतें और
बहुत कुछ
जो तुमसे जुड़ा था
बिखर सा गया है
रह गयी है तो बस
फिजाओं में एक
भीनी सी महक
गर्मी की पहली बारिश में नहाई
सौंधी मिटटी सी





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