Sunday, November 14, 2010

आड़ी-तिरछी लकीरें

वक़्त                             
हाथों की लकीरों से
मिलकर
जीस्त के पन्नो पर
जो आड़ी-तिरछी लकीरें
खिंच देता है
वो
मिटते नहीं कभी
हाँ धूमिल
जरूर हो जाते हैं
और
मन की जमीं पे
जब-जब
बारिश होती है
उभर आते हैं 
बिलकुल वैसे
जैसे
अभी खिचे गए हों ..

3 comments:

  1. waqt aur haathon ki lakeerein mil kar saazishein rachte rehte hain ... bahut khoobsurta thought rajni ...

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  2. अच्छी रचना ,जीस्त का अर्थ समझ नहीं आया !
    इस बार मेरे ब्लॉग में......... महंगी होती शादियाँ

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