वक़्त
हाथों की लकीरों से
मिलकर
जीस्त के पन्नो पर
जो आड़ी-तिरछी लकीरें
खिंच देता है
वो
मिटते नहीं कभी
हाँ धूमिल
जरूर हो जाते हैं
और
मन की जमीं पे
जब-जब
बारिश होती है
उभर आते हैं
बिलकुल वैसे
जैसे
अभी खिचे गए हों ..

waqt aur haathon ki lakeerein mil kar saazishein rachte rehte hain ... bahut khoobsurta thought rajni ...
ReplyDeleteअच्छी रचना ,जीस्त का अर्थ समझ नहीं आया !
ReplyDeleteइस बार मेरे ब्लॉग में......... महंगी होती शादियाँ
nice
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