वक़्त
हाथों की लकीरों से
मिलकर
जीस्त के पन्नो पर
जो आड़ी-तिरछी लकीरें
खिंच देता है
वो
मिटते नहीं कभी
हाँ धूमिल
जरूर हो जाते हैं
और
मन की जमीं पे
जब-जब
बारिश होती है
उभर आते हैं
बिलकुल वैसे
जैसे
अभी खिचे गए हों ..




