"दिल" ये दिल कितना कुछ कहना चाहता है पर हम चाह कर भी कई बार इस दिल की बात नहीं सुन पाते ज़्यादातर हमारा दिमाग इस बेचारे दिल पर हावी रहता है और इस इंद्रधनुष के जो रंग कैनवस पर नहीं उतर वे अधूरे विचार वे बातें मस्तिष्क में उथल पुथल मचाते हैं पर बहार नहीं आ पाते.... ऐसी ही बाते जो हम सब करना चाहते हैं पर कर नहीं पाते... तो आइये हम सब मिलकर बाँटें अपने दिल का दर्द और कुछ अधूरी बातें.....
रजनी जी बहुत ख़ूबसूरत और मुकम्मल लग रही है आपकी ग़ज़ल !
मैं रहा हूं गुलाब भी कुछ दिन मुझपे तब ख़ुशबुओं के साये थे इस शे'र सहित यह शे'र भी बहुत पसंद आया - मैंने लहरों पॅ ख़्वाब रख रख कर पानियों पॅ नगर बसाए थे हां , राह में कोई 'भी' दरख़्त न था ऐसे होता , शायद भी लिखने से छूट गया … या , इस वज़्न का कोई और लफ़्ज़ । सुधार लें !
bahut sunder rachna rajni ji....
ReplyDeleteshukriya xitija ji
ReplyDeleteरजनी जी
ReplyDeleteबहुत ख़ूबसूरत और मुकम्मल लग रही है आपकी ग़ज़ल !
मैं रहा हूं गुलाब भी कुछ दिन
मुझपे तब ख़ुशबुओं के साये थे
इस शे'र सहित यह शे'र भी बहुत पसंद आया -
मैंने लहरों पॅ ख़्वाब रख रख कर
पानियों पॅ नगर बसाए थे
हां , राह में कोई 'भी' दरख़्त न था ऐसे होता , शायद भी लिखने से छूट गया … या , इस वज़्न का कोई और लफ़्ज़ ।
सुधार लें !
शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार
bahut bahut shukriya rajender ji
ReplyDeleteरजनी जी
ReplyDeleteबहुत पसन्द आया
हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..