Saturday, October 2, 2010

"कल रात"






रात भर कल वह याद आये थे  
दीप पलकों पे झिलमिलाये थे

मैं रहा हु गुलाब भी कुछ दिन
मुझपे तब खुशबुओं के साए थे

उनकी बातों से रंग झरता था
तितलियों कि ज़बान लाये थे

राह में कोई भी दरख़्त ना था
फिर मेरे सर पे किसके साए थे

मैंने लहरों पे ख्वाब रख - रखकर
पानियों पे नगर बसाये थे

5 comments:

  1. रजनी जी
    बहुत ख़ूबसूरत और मुकम्मल लग रही है आपकी ग़ज़ल !

    मैं रहा हूं गुलाब भी कुछ दिन
    मुझपे तब ख़ुशबुओं के साये थे

    इस शे'र सहित यह शे'र भी बहुत पसंद आया -
    मैंने लहरों पॅ ख़्वाब रख रख कर
    पानियों पॅ नगर बसाए थे

    हां , राह में कोई 'भी' दरख़्त न था ऐसे होता , शायद भी लिखने से छूट गया … या , इस वज़्न का कोई और लफ़्ज़ ।
    सुधार लें !

    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  2. रजनी जी
    बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

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