"दिल" ये दिल कितना कुछ कहना चाहता है पर हम चाह कर भी कई बार इस दिल की बात नहीं सुन पाते ज़्यादातर हमारा दिमाग इस बेचारे दिल पर हावी रहता है और इस इंद्रधनुष के जो रंग कैनवस पर नहीं उतर वे अधूरे विचार वे बातें मस्तिष्क में उथल पुथल मचाते हैं पर बहार नहीं आ पाते.... ऐसी ही बाते जो हम सब करना चाहते हैं पर कर नहीं पाते... तो आइये हम सब मिलकर बाँटें अपने दिल का दर्द और कुछ अधूरी बातें.....
Wednesday, October 13, 2010
खुदखुशी
कल खिड़की से देखा.. सूरज ने नदी मे डूब कर खुदखुशी कर ली फिर देखा उसी नदी से.. एक सफ़ेद साया उभर आया शायद सूरज का ही भूत था और लोग कहने लगे कि चाँद निकल आया है
सुंदर कल्पना।
ReplyDeletehi rajani ji
ReplyDeleteaap ki blog nice hai or rahi bat poetry lover ki to visit my blog one time
thanking u
and send me ur e-id
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ReplyDeleteबहोत ही अच्छी रचना
ReplyDeleteaap sab ka shukriya
ReplyDeleteWaah...Behtreen bhaw.....
ReplyDeleteवाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.
ReplyDeleteआप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
बधाई.
आज पहली बार आपके ब्लाग पर आया हूँ
ReplyDeleteएक अगल ही तरह की पढने को मिली
बहुत अच्छी अभिव्यति है