Tuesday, October 26, 2010

कुछ ख्वाबों की राख

कुछ ख्वाबों की राख                         
आज एक पुराने डब्बे मे मिली
नरम गुलाबी  धागे से बंधे   
कुछ पन्ने
और उन पर नीली स्याही से लिखे हुए
कुछ नगमे
आँख से टपके हुए अश्को के सूखे धब्बे
और मुरझाये हुए फूलो के कुछ बिखरे कतरे 
सफ़ेद कागज़ पर पिरोये कुछ सुनहरे मोती
कुछ खत जो उसने मुझे लिखे थे कभी 
एक कोने मे चाँदी की एक तन्हा पायल  
और एक कढ़े  हुए रुमाल मे दो सुरख लबो के निशान
इन कत्ल हुए ख्वाबों मे ज़िन्दा है कुछ अब भी
इक भीनी सी खुशबू
कुछ तेज़ धड़कने  
और बन्द आँखो के पीछे
उसके प्यार की नमी  

5 comments:

  1. rajni its just out of the world ... dil ko chu gayi sach mein .... beautiful ...khas kar last ki chaar lines ... really

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  2. भावनाओं को शब्दों में बड़ी खूबसूरती से पिरोती हैं आप

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  3. वो अश्क ,वो तनहा-लम्हे ,वो खाक-ए-जमाना ,
    कुछ-यादों की परछाइयाँ ,मिलकियत है इस जिंदगी की |
    एक बहुत ही सुन्दर रचना | ये है कविता | बहुत-बहुत बधाई | धन्यवाद |

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